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आमिल मुअक्किल को कब्जे में कैसे करता है

 

जब अल्लाह के किसी नाम या आयत को ख़ास तरीकों और शर्तों के साथ पढ़ा जाता है तो इन नामो और आयातों के ज़िक्र की वजह से ज़िक्र करने वाले की जुबां से नूर पैदा होता है और यही नूर इंसानी दिल ,पाक रूहों, फरिश्तों, मुआक्किलों और मुस्लमान जिन्नात की गिज़ा यानी उनका खाना होता है

जिस तरह परवाने शमा के जलने पर उसके चारों ओर चक्कर लगते है और उस पर दीवाना वार गिरते है उसी तरह ये मुआक्किल, जिन्नात, फरिश्ते अपनी अन्दुरूनी रोहानी गिज़ा हासिल करने के लिए ज़िक्र करने वाले के पास जमा हो जाते है और उससे लुत्फ़ लेते रहते है

फिर एक वक़्त ऐसा आता है कि ये सब अल्लाह के हुक्म से ज़िक्र करने वाले के काबू में आ जाते जाते है और उसके फर्मांबरदार हो जाते है वो उस आमिल के मुअक्किल बन जाते हैं  ज़िक्र करने वाला फिर इन से दीनी और दुनियावी कामों में मदद हसिल करता है

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